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सांझा विरासत के मुहावरे से चिढ़ क्यों---के.पी.सिंह जालौन
Date: 2013-Nov-25, Mon   |   Time: 13:56:25   |   SONI News
 
भारत के वर्तमान समाज, संस्कृति और इतिहास को सांझा विरासत मानने से एक वर्ग को बड़ा एतराज है। सांझा विरासत का मुहावरा उसकी निगाह में एक कलंक है जो हिंदू समाज के अपमान और उत्पीड़न के दौर की याद दिलाता है। यह वर्ग सांझा विरासत के यथार्थ पर भविष्य की नींव बनाने की वजाय अनदेखे अतीत की वापसी की बाट जोह रहा है। भारत जैसे उथल पुथल से भरे इतिहास वाले प्राचीन देश में ऐसा होना स्वाभाविक है। दरअसल भारत में लोगों में अभी भी वैज्ञानिक चेतना का विकास नहीं हुआ है। लोग नहीं जानते कि जीवन और समाज का स्वरूप और परिस्थितियां निरंतर बदलती रहती हैं और संक्रमण काल में टिकाऊ व्यवस्था के लिए नया प्रबंधन तैयार या आविष्कृत करना पड़ता है। यह तब भी हुआ था जब साम्राज्यों के विस्तार उत्तर दक्षिण की सीमाओं को तोड़ने लगे। सामा्रज्य अपने से अलग जलवायु, नस्ल, भाषा के क्षेत्र में प्रवेश करते गये तो इस देश की सीमाओं की विराटता बढ़ती गई। अलग-अलग राजनैतिक सत्ताओं के बावजूद संस्कृति के स्तर पर इस विराटता को एक सूत्र में पिरोने के लिए आदि गुरू शंकराचार्य ने पूर्व पश्चिम-उत्तर दक्षिण में चार धाम स्थापित किये। सम्राट अशोक के समय राजकीय धर्म बौद्ध था लेकिन सनातम धर्म को भी राज्य का भरपूर आश्रय प्राप्त था। कन्नौज के समा्रट हर्षवर्धन के समय सनातनियों और बौद्धों को समान रूप से राज्य का संरक्षण व प्रोत्साहन प्रदान कराया गया। जब इस्लाम भारतीय समाज का हिस्सा बनने लगा तो संक्रमण काल में उत्पन्न जटिलताओं के प्रबंधन के लिए नये समायोजन की जरूरत पड़ी। इस्लाम के प्रभाव से समता के मूल्य के महत्व को भारतीय समाज ने अनुभव किया। संत कबीर को अपने गुरू रामानुज से वर्ण व्यवस्था के चलते ही सीधे आशीर्वाद मिलना संभव नहीं हुआ था। जिसकी कसक उन्हें नयी चेतना के पदार्पण के कारण बेहद चुभी। उन्होंने रामानुज को अनजाने में मिले मंत्र का वरण कर आजीवन अपने गुरू का दर्जा जरूर दिया लेकिन उनके काव्य में जिस वर्ण व्यवस्था में रामानुज की आस्था थी उसे सिर झुकाकर स्वीकार करने के भाव के स्थान पर विद्रोह के स्वर मुखरित रहे। इसके साथ ही उनके समय सिकंदर लौधी की धर्मान्ता का कहर हिंदू समाज पर टूट रहा था लेकिन सात्विक संत होने के नाते उनके मन में इसके लिए इस्लाम की शिक्षाओं को दोषी मानने की भावना नहीं आयी। उन्होंने पाया कि जब दो संस्कृतियां एक मोड़ पर मिलती हैं तो उनका संगम हो तब खूबसूरत मिली जुली संस्कृति विकसित होती है लंेकिन ऐसी परिघटना से सांस्कृतिक टकराव की भी गुंजाइशे पैदा हो जाती हैं। उन्होंने इस टकराव के उद्दीपक कारणों की शिनाख्त की और वह भी बहुत सटीक। दरअसल संस्कृति निर्माण की आदिम प्रक्रिया बहुत ही सरल और निर्मल थी जो जन संस्कृति के रूप में पहचानी जाती है। खेतों में काम करते-करते श्रमिक अपनी थकान मिटाने के लिए जिन स्वर लहरियों की रचना करते हैं जनसंस्कृति का एक पहलू उनके जरिये सामने आया है। जब समाज की संरचना वर्गीय हुई तो शासक वर्ग ने अपनी श्रेष्टता स्थापित करने के लिए आडंम्बर की संस्कृति के सृजन की परंपरा निर्मित की। अगर तिलक, जनेऊ के पीछे लोगों की सेहत दुरस्त रखने के वैज्ञानिक कारण हैं तो इस लाभ को उठाने का अवसर सबकों क्यों नहीं दिया गया। शूद्रों को हीनभावना के गर्त में धकेलने के लिए समाज के प्रभु वर्ग द्वारा ओढ़ी जाने वाली यह निशानियां आडंम्बर की संस्कृति का एक ज्वलंत रूप है। आडंम्बर और कर्मकांड से मुक्ति की क्रांति के रूप में जिन बौद्ध और इस्लाम पंथों का आविर्भाव हुआ वे भी आगे चलकर आडंम्बर से असंपृक्त नहीं रह सके। इसी कारण कबीर ने इस्लाम के अनुयायियों और सनातनियों दोनों के आडंम्बर पर प्रहार किया ताकि जनसंस्कृति के धरातल पर दोनों संस्कृतियों का मनोहारी संगम आकार ले सके। कबीर का परिवार आर्थिक तौर पर दरिद्रता का भुक्तभोगी बना हुआ था। यानि सामाजिक व आर्थिक दोनो स्तरों पर वर्गीय श्रेणीकरण में वे जन का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इस कारण आडंम्बर की संस्कृति का प्रतिरोध करने की उनकी नियति तय थी। आडंम्बर की संस्कृति ज्ञान को गूढ़ बना देती है जबकि जन संस्कृति सहजता में अभिव्यक्त होती है। इसीलिए कबीर के पदो में भाषा, विन्यास सभी स्तरों पर अनगढ़ सहजता है। आश्चर्य यह है कि इसके कारण कबीर न तो हिंदुओं के कोपभाजन बने और न ही मुसलमानों के जबकि उन्होंने दोनो की तथाकथित आस्थाओं पर बहुत ही कटु शब्दांे में चोट की है। उल्टे दोनो समुदायों ने उन पर अपनी श्रद्धा उड़ेली। यह बेवाकी और फक्कड़पन का समाज से अनिवार्य प्रतिदान था। कबीर का जिक्र इसलिए किया गया क्योंकि सांझा विरासत का सामाजिक, सांस्कृतिक आधार तैयार करने वालों में वे सबसे बड़े प्रतीक हैं। कला, साहित्य और संस्कृति से सांझा विरासत की शुरूआत हुई। जिसने सत्ता समाज पर भी अपना असर डाला मुगलों की नीतियों में इसका प्रतिबिम्ब झलका और इसकी चरम परिणति प्रथम स्वाधीनता संग्राम में देखने में आयी जब क्रांति सफल होने के बाद भावी सम्राट कौन हो इस प्रश्न पर विचार किया गया। इसे लेकर किसी हिंदू राजा पर एकमतता नहीं हो सकी लेकिन राजकाज और सैन्य संचालन से ज्यादा शायरी में प्रवीण अंतिम मुगल बहादुर शाह जफर के लिए इस पर सहज स्वीकृति हो गयी। साजी संस्कृति के यथार्थ को मिटाया नहीं जा सकता लेकिन फिर भी इसका स्वप्न देखा जा रहा है तो इसके पीछे वहीं सांस्कृतिक कारण है जिन्हें टकराव के कारक के रूप में कबीर ने चिंहित किया था। आडंम्बर की संस्कृति से उबरकर जनसंस्कृति को तराशना होगा तो सांझा संस्कृति के फलितार्थ के आधार पर देश की तरक्की की नयी इबारत लिखने में कामयाबी मिल पायेगी।

k.p singh


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